वैश्विक महामारी, आरोग्य ऐप और निजता पर संकट

वैश्विक महामारी, आरोग्य ऐप और निजता पर संकट:  महेन्द्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

वैश्विक महामारी, आरोग्य ऐप और निजता पर संकट:


वैश्विक महामारी कोविड-19 से निपटने के लिए पूरी दुनिया हर संभव कोशिश कर रही है। कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज तक पहुंचने के लिए दुनियाभर की सरकारें तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। 

गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियां महामारी पर नियंत्रण पाने में सरकार की मदद कर रही हैं। 

अमरीकी मीडिया के अनुसार, गूगल और फेसबुक इस महामारी से लड़ाई में स्मार्टफोन से यूज़र्स का लोकेशन डाटा एकत्र कर सरकार से शेयर कर रही हैं।

इसी प्रकार भारत सरकार ने भी ‘आरोग्य सेतु’  नाम का ऐप बनाया है। ये ऐप कोविड-19 से संक्रमित व्यक्तियों और कोरोना से निपटने के उपायों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराता है। 

लेकिन इसी के साथ भारत समेत विभिन्न देशों की सरकारों पर नागरिकों की निजता के उल्लंघन का आरोप भी लग रहा है। 

पहले समझ लेते हैं कि आरोग्य सेतु है क्या और फिर निजता के अधिकार के बारे में विस्तार से बात करेंगे।

सम्बन्धित खबरें पढने के लिए यहाँ देखे

See More Related News


क्या है आरोग्य सेतु



कोविड-19 से संक्रमित व्यक्तियों और कोरोना से बचाव के उपायों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने का एक जरिया है आरोग्य सेतु ऐप। 

किसी व्यक्ति को कोरोना वायरस का कितना जोखिम है इसका ये ऐप अंदाज़ा लगाता है। 

आरोग्य सेतु ऐप लोगों की गतिविधियों का विश्लेषण करता है। 

ऐप इसके लिए ब्लूटूथ तकनीक, एल्गोरिदम (Algorithm) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग करता है।

एक बार फोन में इन्स्टॉल होने के बाद यह ऐप नज़दीक के किसी फोन में आरोग्य सेतु के इन्स्टॉल होने की पहचान कर सकता है। 

सरकार का दावा है कि ऐप अपने उपयोगकर्त्ताओं के अन्य लोगों के साथ संपर्क को ट्रैक करता है। 

किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में होने के संदेह की स्थिति में उपयोगकर्ता के साथ-साथ अधिकारियों को भी सतर्क करता है। 

ये ऐप संक्रमण के जोखिम की गणना भी कर सकता है। हालांकि ये कितना कारगर है इसका कोई स्पष्ट विश्लेषण सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है।
 

आरोग्य सेतु और निजता पर संकट



इस ऐप को लेकर कई विशेषज्ञों ने निजता संबंधी चिंता जाहिर की है। हालाँकि केंद्र सरकार इन चिंताओं को सिरे से खारिज चुकी है। 

सरकार का दावा है कि किसी व्यक्ति की गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए लोगों का डेटा उनके फोन में लोकल स्टोरेज में ही सुरक्षित रखा जाएगा। 

इसका प्रयोग तभी होगा जब उपयोगकर्त्ता किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आएगा जिसकी कोविड-19 की जाँच पॉजिटिव हो।

हालांकि फ्रांस के हैकर और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ एल्लोट एल्ड्रसन ने दावा किया कि ऐप में सुरक्षा को लेकर कई गंभीर खामियां हैं। 


और इस ऐप से करोड़ों भारतीयों की निजता को खतरा है। 

हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने उनके दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह ‘मोबाइल ऐप’ निजता की सुरक्षा एवं डेटा सुरक्षा के संदर्भ में ‘‘पूरी तरह से मजबूत और सुरक्षित’’ है।

सरकार के दावे के उलट विशेषज्ञों मानना है कि कौन सा डेटा एकत्र किया जाएगा, 

इसे कब तक स्टोर किया जाएगा और इसका उपयोग किन कार्यों में किया जाएगा, 

इस पर केंद्र सरकार की तरफ से स्पष्ट और पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

सरकार ऐसी कोई गारंटी नहीं दे रही कि हालात सुधरने के बाद इस डेटा को नष्ट कर ही दिया जाएगा।

चिंताजनक तथ्य ये भी है कि सरकारें स्वयं मरीज़ों और संभावित संक्रमित लोगों की संवेदनशील जानकारी मुहैया करा रही हैं। 

निजता के विषय पर शोध करने वाले शोधकर्त्ताओं का मानना है कि हर केस की जो विशेष जानकारी प्रकाशित की जाती है, उससे वो चिंतित हैं। 

कोविड-19 से बीमार व्यक्ति या क्वॉरन्टीन किये गए लोगों की पहचान आसानी से हो सकती है जिससे उनके निजता के अधिकार का हनन होता है।

इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के जरिये एकत्रित किये जा रहे डेटा के प्रयोग में लाए जाने से निजता के अधिकार का हनन होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायलय के आदेश का भी उल्लंघन होगा 

जिसमें निजता के अधिकार को मूल अधिकार बताया गया है।

जीवन में निजता का महत्त्व 


निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायत्तता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। 

वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों का आधार है। 

दरअसल निजता का अधिकार नागरिकों के लिए एक ऐसा कवच है जो उनके जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से उन्हें बचाता है।


हालांकि जिसप्रकार तकनीक हमारे जीवन का हिस्सा बनती जा रही है, ऐसे में निजता पर संकट हमेशा बना रहता है। मसलन हम सब मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। 

फोन में कई तरह के ऐप डाउनलोड करते हैं। 

जब भी कोई ऐप डाउनलोड करते हैं तो वो ऐप फोन के कैमरा, कॉन्टेक्ट और गैलरी इत्यादि के प्रयोग की अनुमति मांगता है और इसके बाद ही डाउनलोड किया जा सकता है। 

ऐसे में हमेशा ये खतरा बना रहता है कि यदि किसी ने उस ऐप के डेटाबेस में सेंध लगा दी तो क्या होगा। जाहिर है निजता का संकट गंभीर है और चारों तरफ है। 

हालांकि ये पूरी तरह से हमारी इच्छा पर आधारित है कि हम किस ऐप को अपने फोन में डाउनलोड करें और किसको नहीं। 

लेकिन सरकार की दखलंदाज़ी ज्यादा गंभीर होती है। क्योंकि सरकार निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करती है।

आधार का मामला इसका सटीक उदाहरण है। 


भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से आए आधार को मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में अनिवार्य कर दिया गया। 

यहां तक कि बैंक खाता खोलने से लेकर पैन कार्ड बनवाने तक आधार को अनिवार्य करने की भरसक कोशिश की गई। 

यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। 

इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए अनिवार्य है, वो गंभीर खतरे में है।

संविधान का अनुच्छेद 21 और निजता का अधिकार


24 अगस्त 2017 को नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अपने ऐतिहासिक फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया। 

पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए. बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ़. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल थे।

प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसले में कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के भाग-3 का स्वाभाविक अंग है।


निजता की श्रेणी तय करते हुए न्यायालय ने कहा कि निजता के अधिकार में व्यक्तिगत रुझान और पसंद को सम्मान देना, 

पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी करने का फैसला, बच्चे पैदा करने का निर्णय, जैसी बातें शामिल हैं। 

किसी का अकेले रहने का अधिकार भी उसकी निजता के तहत आएगा। 

निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्तता की सुरक्षा करता है और जीवन के सभी अहम पहलुओं को अपने तरीके से तय करने की आज़ादी देता है। 

न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह निजता का दावा नहीं कर सकता।

न्यायालय ने यह भी कहा है कि निजता को केवल सरकार से ही खतरा नहीं है बल्कि गैरसरकारी तत्त्वों द्वारा भी इसका हनन किया जा सकता है। 

न्यायालय ने ये भी कहा है कि ‘किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना उस पर काबू पाने की प्रक्रिया का पहल कदम है’। 

इस तरह की जानकारियों का प्रयोग असहमति का गला घोंटने में किया जा सकता है। 

अतः ऐसी सूचनाएँ कहाँ रखी जाएंगी, उनकी शर्तें क्या होंगी, किसी प्रकार की चूक होने पर जवाबदेही किसकी होगी? इन पहलुओं पर गौर करते हुए कानून बनाया जाना चाहिये।

निजता के मौलिक अधिकार होने का महत्व


संविधान में नागरिकों को जो सबसे महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं उन्हें कहते हैं मौलिक अधिकार। 

नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च कानून के द्वारा की जाती है, जबकि सामान्य अधिकारों की रक्षा सामान्य कानून के द्वारा की जाती है। 

दरअसल, संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकार के प्रावधान हैं। इन्हें संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है।

मूल अधिकारों के अनुच्छेद 21 में जीवन तथा स्वतन्त्रता का अधिकार है। 


न्यायपालिका ने पहले भी कई निर्णयों के माध्यम से इसके दायरे का विस्तार करते हुए इसमें भी शिक्षा, स्वास्थ्य, त्वरित न्याय, बेहतर पर्यावरण आदि को जोड़ा है। 

निजता के अधिकार के महत्व को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी इसमें जोड़ दिया है।

संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत उच्चतम न्यायालय का निर्णय देश का कानून माना जाता है। 

जब निजता भी मौलिक अधिकार का हिस्सा बन गई है तो फिर कोई भी व्यक्ति अपनी निजता के हनन की स्थिति में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायायलय में सीधे याचिका दायर कर न्याय की मांग कर सकता है।

निजता के मामले में न्यायालय एकदम स्पष्ट है। 

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि किसी के कल्याण के नाम पर उससे उसके अधिकार नहीं छीने जा सकते हैं।

जनता सरकार की आलोचना कर सकती है, उसके खिलाफ प्रदर्शन कर सकती है, अपने  मानवाधिकारों के हनन को लेकर सड़क पर उतर सकती है। 

न्यायालय की 9 जजों की संविधान पीठ ने इन बातों को बड़े ही सुस्पष्ट ढंग से कहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश भारी संकट से गुजर रहा है। 

वैश्विक महामारी कोविड-19 से निपटने के लिए असाधारण उपायों की ज़रूरत है। 

सरकार ने इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए सभी नागरिकों को आरोग्य सेतु ऐप को अपने-अपने फोन में इन्स्टॉल करने का निर्देश दिया है। 

लेकिन ये ऐप जिस प्रकार लोगों से व्यक्तिगत जानकारी मांगता है उससे लोगों के मन में कुछ संदेह पैदा हुए हैं।

लोगों का कहना है यह उनकी निजता के अधिकार में हस्तक्षेप है। 

जाहिर है ऐसी स्थिति में सरकार को लोगों की सभी शंकाओं का समाधान करना चाहिए।

वैश्विक महामारी, आरोग्य ऐप और निजता पर संकट:  

महेन्द्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

आरोग्य ऐप और निजता पर संकट