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भारत की विकास यात्रा

भारत की विकास यात्रा -

आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई और उजली चमकती सुबह के साथ उठेगा, 

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. प. जवाहर लाल नेहरु के 15 अगस्त 1947 को लालकिले की प्राचीर से दिए गए ऐतिहासिक उद्बोधन ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ की ये पंक्तियाँ आज भी भारतीय इतिहास में अपना एक अलग स्थान रखती हैं.

भारत की विकास यात्रा

भारत को आजादी, हजारों सालों तक विदेशी आक्रान्ताओं एवं औपनिवेशिक ताकतों के अवैध अतिक्रमण के खिलाफ संघर्ष कर मिली, जिससे इसके मायने कहीं ज्यादा बढ़ जाते हैं.

हालाँकि, इस पूरे कालखंड में भारत के गौरवपूर्ण इतिहास, संस्कृति एवं परम्पराओं को जो क्षति पहुंची, उसकी भरपाई अभी तक नहीं हो पाई है.

खैर, अब हम स्वतंत्र हैं.

आजादी के बाद जब भारत राष्ट्र-निर्माण और सर्वांगीण विकास की ओर ले जा रहे एक अनसुलझे प्रश्न के उत्तर की खोज में था जिससे करोड़ों भारतीयों के स्वप्न जुड़े थे, तब राष्ट्र-निर्माताओं ने इस अथक व निरंतर यात्रा की शुरुआत की.

उन्हें ऐसे स्वावलंबी भारत के विकास का ब्लूप्रिंट तो तैयार करना ही था वरन् आने वाले समय के अभाव व गंभीरता को समझते हुए इस कार्य को जल्द ही अंजाम भी देना था.

विभाजन का दंश झेल चुके भारत ने सबसे पहले अपने एकीकरण की दिशा में कदम बढाया और राष्ट्रीय एकता के एक नए अध्याय का सूत्रपात किया.

भारत जैसे व्यापक भौगोलिक स्वरूप और प्रादेशिक-सांस्कृतिक विविधता वाले देश में ये कार्य कतई आसान नहीं था, लेकिन तमाम मुश्किलों के समाधान के बीच भारत फिर उठ खड़ा हुआ.

राष्ट्र-निर्माण की इसी श्रृंखला में आमजन की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु शासन की लोकतान्त्रिक प्रणाली को अपनाया गया जो कि हमारे इतिहास में एक ‘मील का पत्थर’ साबित हुई.

तत्पश्चात, विप्पतियों के रूप में सामने आये युद्ध, अकाल एवं त्रासदियों जैसे तमाम झंझावातों से लड़ते हुए ये यात्रा यूँ ही अनवरत चलती रही.

आजादी के इन सात दशकों में हमने विकास के अन्य क्षेत्रों, शिक्षा, साहित्य-सिनेमा, अंतरिक्ष-अनुसन्धान व खेलों में भी विशिष्ट ख्याति प्राप्त की है.

इस ‘स्वर्णिम यात्रा’ के बावजूद हम पर हमेशा से ही अपनी प्रतिभा व योग्यता के साथ ‘न्याय’ न कर पाने का अनचाहा तमगा लगा रहता है.

इस गंभीर प्रश्न के सटीक उत्तर को लेकर बड़े पैमाने पर विरोधाभास हो सकते हैं जो कि, कम से कम इस सन्दर्भ में स्वाभाविक है.

उदाहरण के लिए, ये घर के उन चार कमरों को सुरक्षा की दृष्टि से ताला लगाने जैसा है, जिसमें हम तीन को तो बंद कर चुके हैं लेकिन एक को ताला लगाना भूल गए.

अब जाहिर हैं खतरा उसी कमरे को हैं. यही विकास के साथ भी है. कहीं न कहीं से कोई न कोई कमी रह ही जाती है.

चलिए, आज स्वतंत्रता के इस महान पर्व पर प्रण लें कि हम उस विकास-रुपी दरवाजे को जल्द ही दुरुस्त करेंगे.

भारत की विकास यात्रा Development journey of India

Written By:


keshav sharma
केशव शर्मा
बी.ए. ऑनर्स (राज.विज्ञान)
राजस्थान विश्वविद्यालय
जयपुर

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