धरा सम्पदा

धरती के धरातल व उसके भूगर्भ में विविध प्रकार की सम्पदाओं का खजाना भरा हैं जैसे खनिज सम्पदा, वन सम्पदा और जल सम्पदा। वन सम्पदा व जल सम्पदा प्रमुख रूप से धरातल पर एवं खनिज सम्पदा धरातल के काफी नीचे भूगर्भ में पायी जाती है। धरा सम्पदा का महत्त्व व संरक्षण न केवल प्राणी मात्र के लिए आवश्यक है अपितु इनका संरक्षण व संवर्धन भी मानव की प्रमुख जिम्मेदारी है। इनके संरक्षण और संवर्धन में मानव का योगदान महत्वपूर्ण है क्योंकि धरा सम्पदा के अंधाधुंध दोहन का जिम्मेदार मानव है।

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धरा सम्पदा के निरंतर व अंधाधुंध विनाश व पुन: उसके संवर्धन के महत्त्व को नकारने से मानव जीवन के लिए कई घातक व विनाशकारी प्रभाव पड़ते हैं। बाढ़, भूकंप, सुनामी, अकाल, पर्यावरण प्रदूषण आदि प्राकृतिक व अप्राकृतिक आपदाओं का प्रमुख कारण इसका संरक्षण और संवर्धन नहीं करना है।

कहने को तो जल पृथ्वी के दो तिहाई भाग पर मौजूद है परन्तु इंसान के उपयोग हेतु इसका कुछ प्रतिशत ही उपलब्ध है। जल सम्पदा के अन्धाधुंध दोहन के कारण अकाल और पीने योग्य जल की काफी कमी हो गई है। नदियाँ सूख रही है, कुओं व तालाबों का जल स्थर चिंताजनक रूप से गिरता जा रहा है। इस गिरते भूजल स्तर के कारण जल की शुद्धता में भारी गिरावट आई है एवं भूजल में खनिज लवणों की मात्रा बहुत बढ़ गई है। जल में फ्लोराइड की अधिकता की वजह से फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो रही है परिणामस्वरूप हड्डियों में टेढ़ापन होनें से लोग असमय ही बुढ़ापे की और अग्रसर हो रहे हैं। दूषित जल की वजह से पानी जनित बीमारियाँ फैल रही हैं। किसी ने सत्य ही कहा है कि तृतीय विश्व युद्ध जल के लिए लड़ा जाएगा।

धरती के गर्भ में खनिजों का भण्डार है जिनमें बहुमूल्य धातुएं जैसे सोना, चांदी, तांबा, जस्ता आदि एवं कोयला व पेट्रोलियम पदार्थों का प्रमुख रूप से दोहन किया जा रहा है। इंसान की प्रगति में खनिज सम्पदा का सर्वाधिक महत्त्व है। कोयले और पेट्रोलियम पदार्थों के बिना इंसान प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता है। इनकी अनुपलब्धता के कारण इंसानी जीवन ठप्प हो जायेगा और सारा औध्योगीकरण रुक जायेगा। बिना पेट्रोल, डीजल और कोयले के कल कारखानें, आवागागमन के सभी साधन बंद हो जायेंगे। खनिज सम्पदा के दोषपूर्ण दोहन से भूकंप की समस्याओं को नकारा नहीं जा सकता है।

जल सम्पदा तथा खनिज सम्पदा के साथ-साथ इंसान नें वन सम्पदा को भी नहीं छोड़ा। वन्य जीवों का घर वन है तथा इनका विनाश करके हम वनीय जीव जंतुओं को उनके घरों से बाहर निकाल रहे हैं और उनके घर नष्ट कर रहें हैं। वनों से हमें लकड़ी व बहुत सी औषधियाँ आदि मिलती है जो मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। वनों की अंधाधुंध कटाई की वजह से पर्यावरण में बदलाव आना शुरू हो गया है जिनमें वर्षा ऋतु का असंतुलन, धरती के तापमान में वृद्धि आदि प्रमुख है। कभी बाढ़, कभी अकाल आदि की समस्याएं वन सम्पदा के नष्ट होनें के कारण हैं।

अगर मानव प्रकृति के नियमों का अनुसरण करके जिये तो जीवमात्र सुखी जीवन जी सकेगा। प्रकृति ने धरती पर विद्यमान समस्त प्राणियों के जीवित रहनें के लिए उनकी आवश्यकता एवं शक्ति के अनुसार भोज्य पदार्थों की व्यवस्था की है जैसे शाकाहारी के लिए शाकाहारी भोजन व माँसाहारी के लिए माँसाहारी भोजन जो की विविध प्रकार के जीव जंतुओं से प्राप्त होता है। शायद तभी ये कहा गया है कि “जीवो जीवस्य भोजनम्” अर्थात जीव ही जीव का भोजन है।

प्रकृति, वातावरण व जीव जंतुओं के मध्य सामानांतर सामंजस्य स्थापित रखनें का उत्तरदायित्व हर प्राणी का होता है जो उसकी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। प्रकृति जहाँ जीवों को जीने का सहारा देती है वही मानव का भी नैतिक दायित्व है कि वह प्रकृति का अपनी शक्ति व ज्ञान द्वारा यथोचित संरक्षण करे।

धरा सम्पदा
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