शायद यही बुढ़ापा है

जब यौवन ढल ढल जाता है।
जब यौवन पतझड़ बन जाता है।
जब स्वास्थ्य कहीं खोनें लगता है।
जब शरीर क्षीण होनें लगता है।
शायद यही बुढ़ापा है।

perhaps it is senility

जब सत्ता छिनती जाती है।
जब सुना अनसुना होने लगता है।
जब कोई पास नहीं रुकता है।
जब खून के रिश्ते रोते हैं।
शायद यही बुढ़ापा है।

जब कुछ कर नहीं पाते हैं।
जब मन मसोसकर रह जाते हैं।
जब बीते दिन बिसराते हैं।
जब वक्त और परिस्थितियाँ बदल न पाते हैं।
शायद यही बुढ़ापा है।

जब मन में ज्वार भाटे उठते हैं।
जब हर मौसम पतझड़ लगता है।
जब पुरानें दरख्तों से खुद की तुलना होती है।
जब मन सदैव विचलित सा रहता है।
शायद यही बुढ़ापा है।

जब दैहिक आकर्षण कम होने लगता है।
जब आत्मिक प्रेम बढ़ने लगता है।
जब समय रुपी दर्पण नए चेहरे दिखाता है।
जब कर्मों का फल याद आता है।
शायद यही बुढ़ापा है।

जब हर वक्त अकेलापन रुलाता है।
जब वक्त काटना दूभर हो जाता है।
जब हर पल दिल घबराता है।
जब यादों का भंवर कचोटता है।
शायद यही बुढ़ापा है।

जब रक्त के सम्बन्ध रंग दिखाते हैं।
जब अपनों में उपेक्षा पाते हैं।
जब बोझ समझ लिया जाता है।
जब अहसान और उपकार गिनाये जाते हैं।
शायद यही बुढ़ापा है।

इस उम्र में बस एक ये रिश्ता जो सब रिश्तों में अनोखा है।
यह रक्त का नहीं, जिस्मों का नहीं, सिर्फ आत्माओ का रिश्ता है।
यह रिश्ता उम्र के साथ गहरा ओर गहरा होता जाता है।
यह निस्वार्थ प्रेम के साथ मृत्यु पर्यन्त निभाया जाता है।
यह पति पत्नी का रिश्ता होता है जो सुख दुःख का सच्चा साथी होता है।
शायद यही बुढ़ापा है।

शायद यही बुढ़ापा है
Perhaps it is senility