मोदी है तो मुमकिन है

पुलवामा आतंकवादी हमले में सीआरपीएफ के जवानों के शहीद होने के बारह दिन पश्चात भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद के ठिकानों को तबाह कर तीन सौ से ऊपर आतंकवादियों को जहन्नुम में पहुँचा दिया है. भारतीय वायुसेना ने रणनीति बनाकर तड़के तीन बजे के लगभग आतंकवादियों के ठिकानों पर अपने बारह मिराज 2000 लड़ाकू विमानों की मदद से पूर्ण किया है. आतंकवादियों पर लेसर गाइडेड बमों का प्रयोग कर अपने टारगेट को अचूकता के साथ संपन्न किया है.

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गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना ने 1971 के पश्चात पहली बार नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवादियों का सर्वनाश किया है. आखिर भारतीय वायुसेना को नियंत्रण रेखा पार करने में लगभग आधा दशक क्यों लगा? दरअसल इतना बड़ा निर्णय लेने के लिए बहुत साहस तथा जन भावना की जरूरत होती है. तो क्या पूर्ववर्ती सरकारें साहसी ना होकर जनभावना की उपेक्षा करती थी?

पुल्मावा आतंकवादी हमले का बदला लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने आमजन में अपनी कठोर निर्णय लेने वाली छवि को और अधिक मजबूत कर लिया है. भारतीय जनता पार्टी भी सेना के इस पराक्रम को अपने चुनावी नारे ”मोदी है तो मुमकिन है” को जन-जन तक पहुँचाना चाहती है. ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को मोदी की इस छवि का फायदा इन आम चुनावों में अवश्य मिलेगा. हो सकता है कि यह नारा भी पिछले चुनाओं के प्रसिद्ध नारे “अबकी बार मोदी सरकार” कि तरह अत्यंत लोकप्रिय होकर जन-जन की जुबान पर चढ़ जाए.

पाकिस्तान का मुद्दा हमेशा भारतीय चुनाव को प्रभावित करता रहा है और इस बात में कोई दोराय नहीं है कि आमजन का नरेन्द्र मोदी में इस बात को लेकर विश्वास है कि ये कठोर निर्णय लेकर पाकिस्तान को सबक सिखा सकते हैं. पाकिस्तान की भूमि पर हमला हमारे जवानों की शहादत का बदला है जिसने सभी भारतीयों का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है.

पहले पकिस्तान को रणनीतिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से अलग थलग करना तथा फिर पाकिस्तानी कब्जे वाली भूमि पर वायुसेना द्वारा हमला कर आतंकवादियों को तबाह कर देना निश्चित रूप से बड़े कदम है जिसके लिए कठोर निर्णय आवश्यक है. कोई भी सैनिक कार्य सफलतापूर्वक तभी अंजाम दिए जा सकते हैं जब सेना तथा सत्ता में पूर्ण समन्वय के साथ-साथ  सैनिकों का मनोबल चरम पर हो. प्रधानमंत्री ने जनमानस की भावना को ध्यान में रख कठोर निर्णय लेकर पकिस्तान को जो सबक सिखाया है उसके लिए भारतीय सेना के साथ-साथ भारत सरकार भी बधाई की पात्र है.

कारगिल युद्ध के पश्चात मिराज विमानों ने एक बार फिर से अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर अपनी उपयोगिता साबित की है. यह गौर करने वाली बात है कि इन मिराज विमानों का उत्पादन भी उसी फ़्रांसिसी कंपनी डसाल्ट एविएशन ने किया है जिसके साथ भारत सरकार राफेल विमान खरीदने जा रही है. मतलब यह है कि राफेल तथा मिराज विमानों को निर्माता कंपनी एक ही है. जब मिराज विमानों ने अपनी उपयोगिता सुनिश्चित कर दी है तो फिर बड़ी आसानी से यह अंदाजा लगाया भी लगाया जा सकता है कि मिराज से उन्नत राफेल विमान भारत के लिए कितने उपयोगी साबित हो सकते हैं.

भारत में विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस पार्टी द्वारा राफेल विमानों के सोदे में घोटाले के आरोप लगाये जा रहे हैं तथा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अपनी सभी सभाओं में इस मुद्दों को उठाकर “चोकीदार ही चोर है” के नारे के साथ जोड़ते है. राहुल गाँधी ने प्रधान मंत्री से प्रेरणा लेते हुए इस नारे की इतनी अधिक मार्केटिंग कर दी है कि उनकी सभाओं में अब यह नारा आम हो गया है. राफेल सौदे को लेकर संसद को भी बहुत दिनों तक ठप रखा गया है.

कोई व्यक्ति चोर है या नहीं इसका फैसला कानून करता है और देश की शीर्ष अदालत ने नरेन्द्र मोदी सरकार को इस सौदे के सम्बन्ध में क्लीन चिट दे दी है. सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के पश्चात किसी को चोर कहना कतई जायज नहीं है. हमारी न्याय व्यवस्था सबूतों के आधार पर चलती है तथा इन्ही के आधार पर अपना फैसला सुनाती है. जब सबूत ही नहीं है तो फिर आरोप लगाना गलत है. बिना सबूतों के आरोप लगाना सिर्फ और सिर्फ राजनितिक लाभ लेने का प्रयास मात्र ही लगता है.

राफेल मामले में उद्योगपति अनिल अम्बानी तथा उनकी कंपनी रिलायंस नवल का नाम भी कांग्रेस पार्टी द्वारा घसीटा जा रहा है. मोदी पर आरोप लगाये जा रहे हैं कि इन्होंने राफेल सौदे में अनिल अम्बानी की सौदे से दस दिन पहले बनी कंपनी को हजारों करोड़ रुपयों का फायदा पहुचाया है. अभी जब विमान ही नहीं आये हैं तो हजारों करोड़ अम्बानी के पास कहाँ से आ जाएँगे. अनिल अम्बानी की कंपनी राफेल विमान की निर्माता कंपनी की रणनीतिक पार्टनर है जिससे सरकार का क्या सरोकार हो सकता है?

दरअसल हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि अनिल अम्बानी की कंपनी रिलायंस इन्फ्रा ने पीपावाव डिफेन्स नामक कंपनी को टेकओवर किया है जो वर्षों से इंडियन नेवी के लिए वारशिप का निर्माण कर रही थी. यहाँ पर राहुल गाँधी का यह दावा कि सौदे से दस दिन पहले बनी कंपनी को राफेल का ठेका दे दिया गया है सरासर गलत प्रतीत होता है. कंपनी दस दिन पुरानी नहीं थी, दस दिन पहले केवल कंपनी का नाम पीपावाव डिफेन्स से रिलायंस डिफेन्स किया गया था. क्या नाम बदल देने से कंपनी के अनुभव समाप्त हो जाते हैं?

एक हास्यास्पद स्थिति यह भी है कि जहाँ एक तरफ राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस पार्टी राफेल सौदे को घोटाला बता रही है वही दूसरी तरफ कांग्रेसी नेता तथा कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में उसी राफेल सौदे के केस में अनिल अम्बानी की कंपनी के पक्ष में तर्क देते नजर आते हैं. कपिल सिब्बल इस स्थिति को कैसे मैनेज करते होंगे कि संसद में अनिल अम्बानी के खिलाफ बोलना है तथा अदालत में उनके पक्ष में बोलना है. कपिल सिब्बल का यह रवैया ही अनिल अम्बानी तथा नरेन्द्र मोदी सरकार को क्लीन चिट दे देता है.

लगता है कांग्रेस ने यह मुद्दा केवल चुनावों में अपनी नैया पार करने के लिए ही उठाया है. रक्षा सौदे पहले भी होते रहे हैं और उनपर भी ऊँगली उठती रही है परन्तु आज तक बोफोर्स, अगस्ता चोपर आदि मामलो में कुछ नहीं हो पाया है. वैसे भी कांग्रेस पार्टी कुछ राज्यों के अतिरिक्त अन्य में समाप्ति की कगार पर है ऐसे में उसे कुछ न कुछ मुद्दा चाहिए.

नरेन्द्र मोदी ने शहीदों के गुनाहगारों को भारत की पराक्रमी सेना के माध्यम से सजा देकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं. यह कार्य दो महीने पश्चात होने वाली चुनावी महाभारत में मोदी के पुनः सत्तारूढ़ होने के लिए ब्रह्मास्त्र जैसा अस्त्र साबित होगा जो कि अन्य विपक्षी पार्टियों के सभी अस्त्रों पर भारी पड़ेगा. इस कार्य में सबसे बड़ी सहायक भारतीय जनमानस की यह सोच भी होगी कि हम चाहे बर्बाद हो जाए परन्तु पकिस्तान आबाद नहीं होना चाहिए.

मोदी है तो मुमकिन है
Modi hai to mumkin hai