ज्वार भाटा के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी

ज्वारभाटा और ज्वार भाटा जिसे अंग्रेजी में टाइड (Tide) कहते हैं, चन्द्रमा, सूर्य तथा पृथ्वी की सम्मिलित गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण समुद्र पर पड़ने वाले उस प्रभाव को कहते हैं जिसकी वजह से समुद्र में तरंगे या लहरें उठती हैं। इस प्रक्रिया में उठने वाली तरंगों की वजह से समुद्र का जल कभी ऊपर उठकर आगे बढ़ता है तथा कभी नीचे गिरकर पीछे की तरफ लौटता है। इस प्रकार सागरीय जल के ऊपर उठकर आगे बढ़ने की प्रक्रिया को ज्वार तथा नीचे गिरकर पीछे लौटने की प्रक्रिया को भाटा कहते हैं।

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चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति का पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रभाव समुद्री जल पर पड़ता है तथा यह प्रभाव ज्वारभाटे के रूप में स्पष्टतः परिलक्षित होता है। पृथ्वी, चन्द्रमा तथा सूरज की परस्पर आकर्षण शक्तियों का नतीजा धरती पर समुद्र में ज्वार भाटे के रूप में दिखाई देता है। ध्यान देने योग्य बात है कि ज्वार की उत्पत्ति चन्द्रमा तथा सूर्य की सम्मिलित गुरुत्वाकर्षण शक्ति की वजह से होती है। पृथ्वी का वह भाग जो चन्द्रमा के सर्वाधिक निकट तथा सम्मुख (ठीक सामने) होता है वहाँ चन्द्रमा का आकर्षण बल अधिकतम होता है अतः इस स्थान पर ज्वार की ऊँचाई सर्वाधिक होती है। इसके विपरीत पृथ्वी का वह भाग जो चन्द्रमा से सर्वाधिक दूर तथा ठीक सामने नहीं होता वहाँ चन्द्रमा का आकर्षण बल न्यूनतम होता है अतः इस जगह ज्वार की ऊँचाई निम्नतम होती है।

सूर्य का आकार तथा आकर्षण बल चन्द्रमा से अधिक होने के पश्चात भी ज्वार पर सर्वाधिक प्रभाव चन्द्रमा का ही पड़ता है क्योंकि सूर्य की दूरी बहुत बहुत अधिक होने के कारण चन्द्रमा की ज्वार उत्पन्न करने की शक्ति सूर्य के मुकाबले लगभग 2.17 गुना ज्यादा होती है।

ज्वार-भाटा के प्रकार

दीर्घ अथवा उच्च ज्वार (Spring Tide)

जब ज्वार के रूप में समुद्र का पानी सबसे अधिक ऊँचाई प्राप्त करता है उसे दीर्घ ज्वार कहते हैं। अमूमन यह अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन होता है क्योंकि इस दिन पृथ्वी, चन्द्रमा तथा सूरज तीनों एक ही सीध में होते हैं तथा तीनों के सम्मिलित प्रभाव की वजह से ज्वार की ऊँचाई सर्वाधिक होती है।

लघु या निम्न ज्वार (Neap Tide)

जब भाटे के रूप में समुद्र का पानी सबसे कम ऊँचाई प्राप्त करता है उसे निम्न ज्वार कहते हैं। यह कृष्ण या शुक्ल पक्ष की सप्तमी या अष्टमी को होता है क्योंकि इस दिन पृथ्वी, चन्द्रमा तथा सूरज तीनों समकोण की स्थिति में होते हैं जिसकी वजह से सूरज तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति परस्पर विपरीत दिशाओं में कार्य करती है नतीजन समुद्री पानी की ऊँचाई कम हो जाती है।

दैनिक ज्वार (Diurnal Tide)

यह नियमित रूप से दिन में एक बार उत्पन होने वाला ज्वार है। यह धरती के किसी स्थान पर तब दिखाई देता है जब चन्द्रमा भूमध्य रेखा से दूर होता है। इसका अन्तराल लगभग 24 घंटे 52 मिनट का होता है अर्थात उक्त समय पश्चात यह वापस दिखाई देता है। अमूमन इस प्रकार के ज्वार मैक्सिको की खाड़ी तथा फिलीपाइन द्वीप समूह में दिखाई देते हैं।

अर्द्ध-दैनिक ज्वार (Semi-Diurnal)

यह नियमित रूप से दिन में दो बार उत्पन्न होने वाला ज्वार है। यह ज्वार अमूमन तब आता है जब चन्द्रमा सीधा भूमध्य रेखा पर चमकता है। इन दोनों ज्वारों के बीच का अंतराल 12 घंटे 26 मिनट का होता है। इस प्रकार के ज्वार अमूमन ताहिती द्वीप और ब्रिटिश द्वीप समूह में नजर आते हैं।

मिश्रित ज्वार (Mixed Tide)

जब दैनिक तथा अर्द्ध दैनिक दोनों प्रकार के ज्वार सम्मिलित रूप से आते हैं तब यह मिश्रित ज्वार-भाटा कहलाता है। यह अमूमन तब दिखाई देता है जब चन्द्रमा की स्थिति भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण की तरफ होती है।

अयनवृत्तीय और विषुवत रेखीय ज्वार (Anaerobic  and Equatorial Linear Tide)

चन्द्रमा के झुकाव की वजह से जब इसकी किरणें कर्क या मकर रेखा पर सीधी पड़ती है तब ऐसी स्थिति में उत्पन्न ज्वार अयनवृत्तीय ज्वार कहलाता है। इस प्रकार के ज्वारों की ऊँचाई में असमानता होती है।

चन्द्रमा के झुकाव की वजह से जब इसकी किरणें विषुवत या भूमध्य रेखा पर लम्बवत पड़ती है तब ऐसी स्थिति में उत्पन्न ज्वार विषुवत रेखीय ज्वार कहलाता है। इस प्रकार के ज्वारों की स्थिति में भी असमानता होती है।

साउथ हैम्पटन ज्वार भाटा (South Hampton Tide)

सामान्यतः दिन में दो बार ज्वार भाटा आता है परन्तु ब्रिटेन के दक्षिणी तट पर स्थित साउथ हैम्पटन में दिन में चार बार ज्वारभाटा आता है। दिन में चार बार ज्वारभाटा आने की प्रमुख वजह यह है कि यह स्थान दो समुद्रों से जुड़ा हुआ है जिनमे एक है इंग्लिश चैनल तथा दूसरा उत्तरी सागर। दोनों समुद्रों में दो-दो बार ज्वार आता है अतः सम्मिलित रूप से यहाँ चार बार ज्वार आता है।

ज्वार भाटा से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

खुले समुद्र में जल के बिना किसी बाधा के बह जाने के कारण ज्वार की ऊँचाई कम होती है इसके विपरीत खाड़ियों तथा अन्य कोई ऐसा स्थान जहाँ स्थल का सहयोग मिलता हो वहाँ ज्वार की ऊँचाई अधिक होती है।

ज्वारीय लहरें नदियों के जल स्तर को ऊँचा उठा देती है फलस्वरूप जलयानों को आतंरिक बंदरगाहों तक पहुँचने में सुगमता होती है।

ज्वार भाटे की वजह से नदियों द्वारा लाया गया कचरा साफ हो जाता है फलस्वरूप डेल्टा बनने की प्रक्रिया मंद पड़ जाती है।

ज्वार के कारण समुद्री जल में निरंतर गति बनी रहती है जिसकी वजह से ठन्डे प्रदेशों में भी समुद्र का जल जमता नहीं है।

ज्वार के कारण समुद्र का खारापन बरकरार रहता है अर्थात लवणों की निश्चित मात्रा बनी रहने की वजह से समुद्री जल में लावण्यता बनी रहती है।

ज्वार भाटे में पैदा हुई ऊँची लहरों की शक्ति का प्रयोग विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

ज्वार भाटा के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी
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