स्मार्टफोन इंसान के जीवन का अभिन्न अंग कैसे है?

कुछ दशकों पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि भविष्य में स्मार्टफोन नाम की किसी चीज का अविष्कार होगा और वह इंसानी जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाएगी। जब टेलीफोन का आविष्कार हुआ था तब इसे संचार क्षेत्र में एक क्रान्ति लाने वाला कदम समझा गया था। ग्राहम बेल ने भी ये कल्पना नहीं की होगी कि उसके अन्वेषित टेलीफोन का इतना परिष्कृत और उन्नत रूप कभी सामने आएगा।

smartphone is an integral part of human life

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब धीरुभाई अम्बानी ने ये कल्पना की थी कि उनका यह सपना है कि दुनिया हर आदमी की मुट्ठी में हो। उस वक्त भी यह मात्र एक कपोल कल्पित ख्वाब ही प्रतीत हो रहा था लेकिन अब यह सपना पूरी तरह से साकार हो चुका है। पहले कोई नई खोज होनें और उसे बाजार में आने में दशकों लग जाते थे परन्तु अब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि दुनिया हर पाँच वर्षो में काफी बदल जाती है। अगर १९५० के दशक के किसी आदमी को आज की दुनिया अचानक से देखनी पड़े तो वह निश्चित रूप से बोखला जायेगा और यकीन ही नहीं कर पाएगा कि इंसान ने इतनी तरक्की कर ली है।

इस इंसानी तरक्की में सबसे क्रांतिकारी तरक्की आधुनिक स्मार्टफोन की है जो कि हमारे रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। हमारा स्मार्टफोन के बिना जीवन जी पाना असंभव सा प्रतीत जान पड़ता है। हाथ में या फिर हमारे पास में अगर स्मार्टफोन नहीं हो तो हमें कुछ अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है। हम स्मार्टफोन के गुलाम बनते जा रहे हैं और वह दिन दूर नहीं है कि जब हमें इसकी दासता से मुक्त होने के लिए भी कुछ नया आविष्कार करना पड़ेगा।

आखिर हम क्यों इस गुलामी की तरफ बढ़ रहे हैं? दरअसल स्मार्टफोन जितना विनाशकारी हो सकता है उतना ही यह आज कल के रोबोटिक जीवन को जीने में सहायक भी है। एक अकेले स्मार्टफोन के जरिये हम कंप्यूटर, रेडियो, म्यूजिक प्लेयर, विडियो प्लेयर, कैमरा, घड़ी, स्टॉपवॉच, टॉर्च आदि के साथ-साथ इन्टरनेट के जरिये मिलने वाली सारी सुविधाओं का उपयोग कहीं भी और कभी भी कर सकते हैं। इन्टरनेट के जरिये देश विदेश की जानकारी के साथ-साथ पूरी दुनिया में किसी के साथ भी संपर्क में रह सकते हैं। पलक झपकते ही किसी भी चीज की टिकट कहीं से भी बुक करवा सकते हैं, ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं, खाने का आर्डर दे सकते हैं, रास्ता ढूँढ सकते हैं और कहीं पर भी बैठ कर पढ़ाई भी कर सकते हैं। अब तो हम यह कह सकते हैं कि बिना स्मार्टफोन के हमारा जीवन अधूरा ही है।

स्मार्टफोन ने जितनी सुविधाएँ दी हैं उससे कहीं अधिक यह हमें नुकसान भी पहुँचा रहा है। इसका सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि इसके कारण इंसान एक दूसरे से काफी हद तक कट गया है। दो इंसान पास-पास बैठकर भी एक दूसरे के पास नहीं होते हैं। दोनों अपने-अपने स्मार्टफोन में व्यस्त रहते हैं। हर आदमी किसी दूसरे से न बतियाकर स्मार्टफोन में ही खोया रहता है। परिवार के लगभग हर सदस्य के पास स्वयं का स्मार्टफोन होता है। जो समय हमें रिश्तों को निभाने और मजबूत करने में व्यतीत करना चाहिए, वो समय हम स्मार्टफोन में व्यर्थ गवा देते हैं। स्मार्टफोन इंसान के जीवन में एकाकीपन को बढ़ा रहा है जिसके कारण रिश्तों में मिठास का लोप होता जा रहा है।

हमें स्मार्टफोन में चाहे कुछ काम हो या न हो हम दिनभर उसी को ही टटोलते रहते हैं। घड़ी-घड़ी उसका स्विच ऑन करके पता नहीं क्या देखते हैं। यह एक मानसिक बीमारी का संकेत है जिसको स्मार्टफोन एडिक्शन कहा जाता है। स्मार्टफोन की पहुँच बच्चों तक भी आसानी तक हो गई है। बच्चे स्मार्टफोन पर गेम खेलनें में काफी मशगूल रहते हैं जिससे वक्त बहुत बर्बाद होता है। धीरे-धीरे इन स्मार्टफोन गेम का भी एडिक्शन होना चालू हो जाता है और स्मार्टफोन पर बिना गेम खेले रहा नहीं जाता है। हर स्मार्टफोन पर इन्टरनेट की आसानी से उपलब्धता के कारण बच्चों में वयस्क और अश्लील कंटेंट देखनें की लत बढती जा रही है जिसके कारण बच्चे असमय ही वयस्क होते जा रहे हैं तथा बचपन गलत रास्तों की तरफ भटक रहा है।

अब हमें सोच विचार करके बुद्धिमतापूर्वक निर्णय लेना होगा कि हमें स्मार्टफोन को एक सुविधा मात्र के रूप में लेना है या फिर उसका गुलाम बनकर अपना और बच्चों का जीवन खराब करना है। अगर हम स्मार्टफोन को मात्र एक गैजेट के रूप में लेकर सिर्फ जरूरत के वक्त ही काम में लें तो शायद हम इसके दुरुपयोग से बच सकते हैं।

स्मार्टफोन इंसान के जीवन का अभिन्न अंग कैसे है?
How Smartphone is an integral part of human life?