उपचुनाव परिणामों के राजनीतिक संदेश का विश्लेषण

अजमेर, अलवर व माण्डलगढ़ उपचुनाव परिणाम ने राजस्थान मे इस साल के अन्त मे होने जा रहे विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व को सकते मे डाल दिया है। राजस्थान सरकार के चार साल पूरे हो चुके है। सरकार व संगठन की जन स्वीकार्यता मे कमी भी उजागर हुई है।

by-election result rajasthan

सरकार की जन कल्याणकारी छवि भी धूमिल होने का आरोप, पक्ष, विपक्ष व मिडिया के द्वारा समय-समय पर लगातार लगाया जा रहा है। भाजपा की चुनाव में पराजय का प्रमुख कारण इसके संगठन की शिथिलता है। संगठन की प्रदेश व जिला स्तर पर कमान उन लोगों के पास है जो संगठन मे कभी नहीं रहे।

संगठन की कमान कार्यकर्ताओं के पास होनी चाहिए परन्तु नेतृत्व ने अपनी सत्ता की महत्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु संगठन को पंगु बना दिया। आलम यह है कि भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष जयपुर शहर के भी नेता नहीं है परन्तु इन्हें प्रदेश की जिम्मेदारी देकर संगठन को कमजोर व पंगु किया गया। कमोबेश यही तस्वीर सभी जिलो की है।

आज की हालत मे भाजपा को अपने घर की सफाई करनी चाहिए। भाजपा को संगठन मे काम करने वाले सर्वस्पर्शी नेतृत्व की जरुरत है। आज भाजपा से राजस्थान की प्रमुख जातियाँ नाराज है। जाट हनुमान बेनीवाल की तरफ जा रहे हैं। राजपूत आनन्दपाल व पद्मिनी के कारण उपचुनाव में खिलाफ रहे। ब्राह्मण व वैश्य जो भाजपा का वोट बैंक रहा है वह भी वह भी धीरे-धीरे दूर छिटकता जा रहा है।

मीणा समाज को किरोड़ी मीणा लेकर खडे है। गहलोत व पायलेट की वापसी के नाम लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ रहने वाला माली व गुर्जर जातियाँ कांग्रेस के साथ खाड़ी हैं। इस हालत मे भाजपा को चेहरा व चिंतन दोनों में बदलाव की सख्त जरुरत है। संगठन को प्रदेश व्यापक प्रभाव रखने वाला युवा तथा कुशल नेता चाहिए। इस श्रृंखला मे सतीश पुनिया, ओम बिरला तथा सुनील बंसल कुछ प्रमुख नाम है।

कुछ नेताओं को साथ रख कर आगे बढने की कयावद होनी चाहिए। धनश्याम तिवाड़ी को मुख्यधारा मे जोड़ा जाए। किरोड़ी लाल व बेनीवाल की घर वापसी हो। राजपूत समाज की नाराजगी बढ़ रही है। सर्वण समाज के आरक्षण की मांग पर भी सकारात्मक पहल हो। सरकार को अपनी छवि सुधारने के लिए संगठन की सफाई करना पहली जरूरत है।

कांग्रेस उपचुनाव परिणाम से उत्साहित है परन्तु राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि सरकार की गलतियों का विरोध कांग्रेस ने चार साल मे कभी नहीं किया। सरकार का सबसे ज्यादा विरोध तिवाड़ी, बेनीवाल व किरोड़ी की त्रिमूर्ति ने ही किया है। इस त्रिमूर्ति के आन्दोलन ने ही सरकार के प्रति विरोध को हवा दी है।

कांग्रेस मे भी आज तीन गुट है। तीनो गुटों ने उपचुनाव का उल्लास अलग अलग जगह मनाया। गहलोत के नेतृत्व मे पायलट व जोशी का काम करना मुश्किल है। इस हालत मे केन्द्रीय नेतृत्व को पहल करना पड़ेगा। कांग्रेस के लिए तीनों गुटों को साधना एक टेढ़ी खीर है।

कुल मिलाकर यह उपचुनाव भाजपा तथा कांग्रेस दोनों के लिए एक टर्निंग पॉइंट है क्योंकि कांग्रेस अपनी गुटबाजी से तो भाजपा अपनी बिगडती छवि से परेशान है।

उपचुनाव परिणामों के राजनीतिक संदेश का विश्लेषण
Analysis of political message of by-election results