राजस्थान के बेरोजगारों का हक मारते अन्य राज्यों के अभ्यर्थी

इस वर्ष के अंतिम महीनों में राजस्थान विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनावी वर्ष होने के कारण राज्य सरकार की कुम्भकर्णी नींद टूट गई है तथा यह बेरोजगारों को लुभाने के लिए ब्रूस ली की सी चपलता के साथ नौकरियों की विज्ञप्तियों के विज्ञापन पर विज्ञापन निकाल रही है। रोज किसी न किसी विभाग में नौकरियों के लिए आवेदन मांगे जा रहे हैं।

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इन विज्ञप्तियों में कुछ विज्ञप्तियाँ ऐसी भी है जो पाँच वर्ष पहले गहलोत सरकार के समय निकाली गई थी तथा जिनकी भर्ती प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो पाई। इन अपूर्ण भर्तियों को नए कलेवर के साथ पुनः प्रस्तुत किया गया है। अब यह देखना बाकी है कि इन निकाली हुई भर्तियों के लिए नियुक्तियाँ कितने वर्षों में मिलेगी।

भर्तियों की विज्ञप्तियोँ के अनुसार अन्य राज्यों के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को राजस्थान की भर्तियों में सामान्य वर्ग में शामिल किया जाएगा। साथ ही अगर इन बाहरी राज्यों का कोई अभ्यर्थी राजस्थान के अभ्यर्थियों से अधिक अंक लाता है तो उसे सामान्य श्रेणी में नौकरी दे दी जाएगी। इस प्रकार दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए राजस्थान में पचास प्रतिशत कोटा निर्धारित हो गया है तथा अन्य राज्यों के अभ्यर्थी अच्छे अंक लाने पर सामान्य श्रेणी की शत प्रतिशत सीटों पर भी नियुक्ति पा सकते हैं।

एक तो सालों के लम्बे इन्तजार के पश्चात भर्तियाँ निकलती हैं दूसरा अन्य राज्यों के बेरोजगार युवा भी इन भर्तियों के लिए आवेदन कर राजस्थान के सामान्य वर्ग के युवाओं का हक छीन रहे हैं। इस प्रकार के नियम लगा कर सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों के हितों के साथ कुठाराघात किया जा रहा है।

राजस्थान के अतिरिक्त अगर अन्य राज्यों की बात की जाए तो बड़ी चौकाने वाली बात सामने आती है। एक तो बहुत से राज्य अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए किसी भी प्रकार का कोटा देते ही नहीं है और अगर कुछ राज्य देते भी हैं तो केवल ऊँट के मुँह में जीरे के समान यानि महज पाँच से दस प्रतिशत तक।

अगर राजस्थान के पड़ौसी राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब तथा उत्तरप्रदेश की बात की जाए तो यहाँ दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए कोटा निर्धारित है। इन तीनों राज्यों में बाहरी अभ्यर्थियों के लिए अधिकतम पाँच प्रतिशत कोटा दिया जाता है। बहुत से राज्यों द्वारा बाहरी राज्यों के उम्मीदवारों को आवेदन करने से रोकने के लिए स्थानीय भाषा के अध्ययन समेत कई शर्ते लगा दी जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप बाहरी राज्यों के उम्मीद्वार अयोग्य हो जाते हैं। जैसे पंजाब में नौकरी पाने के लिए दसवीं कक्षा में पंजाबी भाषा का अध्ययन आवश्यक होने के कारण राजस्थान के अभ्यर्थी इस पाँच प्रतिशत के लिए भी अयोग्य हो जाते हैं। राजस्थान के अभ्यर्थियों के लिए दक्षिण भारत के राज्यों में नौकरी पाना एक सपने के समान है।

सम्पूर्ण भारत में किसी भी राज्य द्वारा बाहरी उम्मीदवारों के लिए राजस्थान जितना कोटा निर्धारित नहीं है। केवल राजस्थान ही एक ऐसा राज्य है जो अपने प्रदेश के बेरोजगारों की चिंता न करते हुए बाहरी अभ्यर्थियों पर मेहरबान है। इस प्रकार की मेहरबानी प्रदेश के सामान्य वर्ग के बेरोजगारों के लिए बड़ी कष्टदायक साबित हो रही है। एक तो पहले से ही सामान्य वर्ग में गलाकाट प्रतिस्पर्धा है, दूसरे अन्य राज्यों के अभ्यर्थी इस प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा रहे हैं परिणामस्वरूप प्रदेश का सामान्य वर्ग नौकरियों के मामले में और पिछड़ता जा रहा है।

जब दूसरे राज्यों की सरकारें अपने बेरोजगारों के हितों का ध्यान रख रही है तो राजस्थान सरकार अपने स्थानीय बेरोजगारों के हितों का ध्यान क्यों नहीं रख रही है? क्या राजस्थान की बेरोजगारी अन्य राज्यों की सरकारें दूर करेंगी? सरकार को समय रहते इस दिशा में उचित ध्यान देकर स्थानीय बेरोजगारों के हितों का ध्यान रखना चाहिए।

राजस्थान के बेरोजगारों का हक मारते अन्य राज्यों के अभ्यर्थी
Candidates from other states entitled to get government jobs in Rajasthan