टेलिकॉम क्षेत्र में प्राइस वार से ग्राहकों की चाँदी

पिछले साल सितम्बर में टेलिकॉम क्षेत्र में रिलायंस जिओ के धमाकेदार प्रवेश के बाद से सभी टेलिकॉम कंपनियों में हडकंप मचा हुआ है। रिलायंस जिओ की फ्री सेवाओं तथा आक्रामक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी ने अन्य कंपनियों के लाभ को घाटे में बदलना शुरू कर दिया है। इस क्षेत्र की शीर्ष कंपनी भारती एयरटेल का मुनाफा नाम मात्र का ही रह गया है तथा आईडिया और रिलायंस कम्युनिकेशन्स दोनों को भारी घाटा उठाना पड़ा है जो कि तिमाही दर तिमाही जारी है। वोडाफोन के भारत में लिस्टेड नहीं होने के कारण उसके बारे में पता नहीं चल पाया है परन्तु इतना तो तय है कि वह भी जिओ की इस फ्री सुनामी से बच नहीं पाई होगी।

telecom price war due to reliance jio

दरअसल कोई भी कंपनी प्राइस वार का मुकाबला प्राइस वार से कर सकती है परन्तु जब कोई कंपनी अपनी सेवाएँ लम्बे समय के लिए बिलकुल फ्री देने पर तुल जाए तब उसका मुकाबला असंभव है। जिओ ने यही स्ट्रेटेजी अपना रखी है। उसने पहले तो कई महीनों तक अपनी सेवाओं को पूर्णतः निशुल्क रखा फिर उसके पश्चात अपनी सेवाओं का शुल्क नाम मात्र का ही रखा है।

जिओ इस देश के सबसे धनी मुकेश अम्बानी के स्वामित्व वाली कंपनी है जो कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के अंतर्गत आती है। रिलायंस इंडस्ट्रीज बाजार पूंजीकरण के लिहाज से इस देश की सबसे बड़ी तथा धनी कंपनी है जिसका तिमाही लाभ ही कई हजार करोड़ रूपए का होता है। अन्य कंपनियों का प्रमुख व्यापार टेलिकॉम होने से उनका इस प्रतिस्पर्धा में टिक पाना असंभव सा प्रतीत होता है।

जिओ ने अपनी फ्री सेवाओं की शुरुआत पिछले वर्ष सितम्बर से की थी अतः जिओ को अपनी पूर्णतः फ्री तथा लगभग फ्री सेवाओं को शुरू किए एक वर्ष हो चुका है। दूसरी कंपनियों ने भी इस फ्री सेवा का मुकाबला करने की भरपूर कोशिश की है तथा अभी भी कर रही है परन्तु किसी भी लड़ाई को लम्बा तभी खींचा जा सकता है जब उसके पीछे सशक्त आर्थिक संबल हो। इस परिस्थिति में जिओ अन्य सभी कंपनियों पर भारी पड़ती दिख रही है।

जिओ अगर लम्बे समय तक भी अपनी सेवाएँ फ्री या नाममात्र के शुल्क पर ग्राहकों को उपलब्ध करवाती रहे तो भी उसकी आर्थिक स्थिति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है परन्तु दूसरी अन्य कंपनियाँ इस तरह से फ्री सेवाएँ लम्बे समय तक उपलब्ध नहीं करवा सकती है। अभी कुछ महीनो में ही इन कंपनियों की आर्थिक स्थिति डावांडोल होकर इन्हें घाटा होना शुरू हो गया है तो फिर लम्बे समय तक ये कैसे इस घाटे को सहन कर पाएँगी?

कंपनियों के बढ़ते घाटे तथा घटते प्राइस की वजह से इन कंपनियों में विलय तथा अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। एयरटेल टेलेनोर का अधिग्रहण कर रही है, वोडाफोन तथा आईडिया आपस में विलय कर रही है। रिलायंस कम्युनिकेशन्स तथा एयरसेल में भी विलय हो रहा है। एमटीएस का पहले ही रिलायंस कम्युनिकेशन्स में विलय हो चुका है। टाटा टेली सर्विसेज भी मार्किट से बाहर निकलने को उत्सुक है। कुल मिलाकर यह बाजार व्यापार के लिहाज से जिओ के आने के पहले जितना आकर्षक लगता था, अब उतना ही अनाकर्षक बन गया है।

जिस प्रकार कुछ वर्ष पहले बहुत सी कंपनियों में टेलिकॉम क्षेत्र में प्रवेश को लेकर होड़ मची थी ठीक उसी तरह अब उनमे टेलिकॉम क्षेत्र से बाहर निकलने की होड़ मच रही है। कोई भी कंपनी घाटे का व्यापार नहीं करना चाहेगी।

ऐसा लगता है कि आने वाले वक्त में इस क्षेत्र में तीन या चार बड़ी कंपनियाँ ही टिक पाएँगी तथा अन्य कंपनियाँ या तो बाजार से बाहर निकल जाएँगी या फिर अन्य कंपनियों में मिल जाएँगी। जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को निंगल जाती है ठीक उसी प्रकार का दृश्य इस समय टेलिकॉम इंडस्ट्री में देखने को मिल रहा है।

कंपनियों की इस लड़ाई में सीधा-सीधा फायदा ग्राहकों का हो रहा है। उसे फ्री में डाटा तथा कालिंग की सुविधा मिल रही है। जिओ ने तो एक कदम आगे बढ़ कर मोबाइल भी फ्री में देने का दावा किया है। आज ग्राहक अपने को फायदे में मानकर बैठा है परन्तु कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में किसी एक ही बड़ी कंपनी के एकाधिकार की वजह से उसे मुह मांगे दाम चुकाकर फ्री में सेवाओं का उपयोग करने का हर्जाना भी चुकाना पड़े।

टेलिकॉम क्षेत्र में प्राइस वार से ग्राहकों की चाँदी
Customers profit due to price war in telecom industry