परिवार के प्रति प्रधानमन्त्री को जिम्मेदारी का अहसास

न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जॉन की के इस्तीफे की खबर का शीर्षक जब समाचार पत्र में छपा तो लगा जैसे कि यह कोई नई बात नहीं है और ऐसे इस्तीफे तो आये दिन दिए जाते हैं परन्तु खबर को विस्तारपूर्वक पढ़ने पर लगा कि यह कोई साधारण कार्य नहीं है। आज के जमाने में जब व्यक्ति किसी छोटे पद को भी नहीं छोड़ सकता है तब कोई व्यक्ति सिर्फ अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर एक झटके में प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद को त्यागने की घोषणा कर दे तो सचमुच यह आश्चर्य से कम नहीं है।

realization of responsibility to prime minister towards family

पचपन वर्षीय जॉन फिलिप की दो हजार चौदह में तीसरी बार न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री बने थे। इन्होने दो हजार आठ में पहली बार प्रधानमन्त्री का पद संभाला था। प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए इन्होने वैश्विक मंदी से न्यूजीलैंड को बड़ी आसानी से छुटकारा दिलाया था। अभी तक इनका नाम किसी भी बड़े विवाद में नहीं आया है तथा इनकी छवि काफी हद तक एक साफ सुथरे राजनेता की है। इन्होने प्रधानमन्त्री पद के साथ-साथ अगले चुनावों के पश्चात राजनीति भी छोड़ देने की बात कही है।

यह खबर उस वक्त अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जब हमें पद त्याग करने के पीछे के कारण का पता लगता है। दरअसल जॉन की ने अपना पद सिर्फ और सिर्फ इसलिए त्यागा है क्योंकि प्रधानमंत्री रहते हुए वे अपने परिवार के साथ वक्त नहीं बिता पा रहे थे। उनको यह अहसास हुआ कि उन्होंने बहुत ज्यादा व्यस्त रहकर अपने परिवार को दिए जाने वाले स्वर्णिम दिनों को खों दिया है तथा अब आगे ऐसा नहीं करना चाहिए।

जॉन की शायद विश्व के पहले ऐसे राजनेता होंगे जिन्होंने किसी भी देश का सर्वोच्च एवं शक्तिशाली पद अपने परिवार को वक्त नहीं दे पाने की वजह से छोड़ा है। आज के समय में जब हर व्यक्ति आचार्य चाणक्य द्वारा प्रतिपादित नीतियों (साम, दाम, दंड, भेद) का पालन करते हुए किसी भी स्तर तक गिरकर शीर्ष पद तक पहुँचने का प्रयास करता है उस समय में किसी व्यक्ति द्वारा उसी शीर्ष पद का त्याग करना प्रशंसनीय है।

बड़ी प्रसन्नता होती है यह देखकर कि अभी भी दुनिया में ऐसे लोग हैं जो अपने पद और पैसे से ज्यादा अपने परिवार के साथ और उनकी खुशियों को प्राथमिकता देते हैं। लोग मोह माया में पड़कर धन और सुख सुविधाओं के लिए अपने परिवार की सुख शान्ति को दाव पर लगा देते हैं। धनार्जन की कोई सीमा नहीं होती है तथा अभिलाषाओं का कोई अंत नहीं होता है। मनुष्य मृत्यु पर्यन्त धनार्जन और उच्च पद प्राप्ति के लिए जद्दोजहद में लगा रहता है।

जब तक मनुष्य को जीवन का सार समझ में आता है तब तक उसकी उम्र जीवन के आखिरी पड़ाव को प्राप्त कर चुकी होती है। फिर आखिरी समय में सिवाय आँसुओं और अधूरी अभिलाषाओं के कुछ भी नहीं रहता है।
शुक्र है कि न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जॉन की को पचपन वर्ष की आयु में ही वह ज्ञान प्राप्त हो गया जिसके लिए लोग मरते दम तक नासमझ बने रहते हैं।

जॉन की ने अपने परिवार के प्रति भावनात्मक लगाव को दर्शाकर उन लोगो को सोचने पर मजबूर कर दिया होगा जो अपने परिवार का मोह त्यागकर सिर्फ और सिर्फ धन और पद का मोह पाले बैठे है।

परिवार के प्रति प्रधानमन्त्री को जिम्मेदारी का अहसास
Realization of responsibility to prime minister towards family