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देशभक्ति के नए पैमाने

भारत में जब आजादी के लिए आन्दोलन चल रहा था उस वक्त भारत की आजादी में किसी भी तरह से दिया गया योगदान तथा अपनी मातृभूमि से प्यार देशभक्ति की श्रेणी में आता था। अभी तक भी यही समझा जाता रहा है कि अपने देश से प्यार के साथ-साथ देश की एकता, अखंडता और प्रगति में दिया गया योगदान ही देशभक्ति है। ऐसा लगता है कि पिछले कुछ समय में देशभक्ति की परिभाषा और पैमाने बदल गए हैं और राजभक्ति ही देशभक्ति हो गई है।

new parameters of patriotism

शायद अब देशभक्त होने का मतलब सरकार के निर्णयों का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समर्थन करना है। जो सरकार के निर्णयों का समर्थन करता है वह देशभक्त और जो सरकार के निर्णयों का विरोध करता है वह राजद्रोही होने के साथ-साथ देशद्रोही भी हो जाता है। सरकार के निर्णयों को शंका से देखना और उन पर किसी भी तरह के प्रश्न उठाना भी राष्ट्रद्रोह और देशद्रोह हो जाते हैं।

आखिर ये देशभक्ति, देशद्रोह, राष्ट्रद्रोह, आदि के प्रमाण पत्र कौन जारी करता है? ये प्रमाण पत्र बाँटने के लिए इन्हें किसने अधिकृत किया? इन नए पैमानों का चलन किसने शुरू किया है? सरकारें तो पहले भी आती जाती रहीं है तथा अब तक किसी ने भी इस तरह के माहौल को नहीं देखा था परन्तु पिछले दो तीन वर्षों में ऐसा क्या हो गया है कि हर कोई इस तरह के प्रमाण बाँटता फिर रहा है।

क्या लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार से सवाल करना मना हो गया है? एक प्रख्यात पत्रकार ने भी अपनी व्यथा कुछ इसी तरह से व्यक्त की है कि अगर हम सवाल नहीं पूछेंगे तो क्या यह पूछेंगे कि “क्या बागों में बहार है?” लोकतंत्र में लोगों का शासन होता है तथा सरकार जनता के प्रति पूर्ण रूप से जवाबदेह होती है। जब सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह होने से कतराती हैं तथा तथा जनता के सवाल पूछनें के अधिकार को समाप्त करनें पर तुल जाती हैं तब देश तानाशाही की तरफ धकेल दिया जाता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और जब इस स्वतंत्रता का हनन होने लगता है तब परिस्थितियाँ भयावह होने लगती है। सोशल मीडिया पर देशभक्त, गद्दार और देशद्रोही के तमगे बाँटे जा रहे हैं। हर कोई सरकार के निर्णयों का समर्थन करके अपने आप को देशभक्त साबित करनें में लगा हुआ है चाहे वह पाकिस्तान के विरुद्ध सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक हो या फिर काला धन रोकने के लिए आनन फानन में लागू की गई नोटबंदी हो।

अभी कुछ दिनों पहले एक बड़े योगगुरु का वक्तव्य आया कि नोटबंदी का विरोध करने वाले लोग राष्ट्रद्रोही हैं। एक योगगुरु का इस तरीके का बयान उनके राजनीतिक स्वार्थ को इंगित करता है। कोई भी आदमी किसी दूसरे को राष्ट्रद्रोही और गद्दार कैसे कह सकता है? आजकल ये शब्द आम शब्दों की तरह से प्रयोग में आ रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के सम्बन्ध में प्रश्न पूछनें को सेना के आत्मसम्मान से जोड़ दिया जाता है और सेना पर ऊँगली उठाना बताकर राष्ट्रद्रोही बता दिया जाता है जबकि प्रश्न सरकार से पूछा गया होता है।

नोटबंदी के पश्चात बैंकों और एटीएमों में लम्बी-लम्बी कतारें लगी हुई है जिनमे अब तक सत्तर से अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। नोटबंदी का विरोध तथा उस पर प्रश्न भी राष्ट्रद्रोह और गद्दारी की श्रेणी में आ गया है। कतार में लगकर धक्के खाना देशभक्ति बताया जा रहा है तो क्या जो कतार में लगकर मर रहे हैं वे शहीदों की श्रेणी में आयेंगे? लोग समझाने में लग रहे हैं कि हम सीमा पर तो देश की सेवा नहीं करते हैं तो हमें कतार में लगकर देशभक्ति का सबूत देना चाहिए। पता नहीं यह माहौल कैसे समाप्त होगा तथा कब हम देशभक्ति को सही तरह से जान पाएंगे।

सच्ची देशभक्ति साबित करने के लिए हम सबको अपने टैक्स की चोरी छोड़नी पड़ेगी, बिना बिल और रसीद के किसी भी तरह के सामान की खरीददारी बंद करनी पड़ेगी तथा सभी तरह के दो नंबर के कामों को बंद करना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर आभासी देशभक्ति करने से देश की कुछ भी भलाई होने वाली नहीं है तथा देशभक्ति जमीनी स्तर पर होनी चाहिए।

देशभक्ति के नए पैमाने
New parameters of patriotism